Saturday, November 20, 2010

कम्प्यूटर पर जमा धूल से रहें सावधान


लंदन. आपके कीबोर्ड और कम्प्यूटर पर जमा धूल आपके फेफड़ों पर एक अलग ही ढंग से कुप्रभाव डाल सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक कम्प्यूटर से लेकर शैम्पू तक हर रोज प्रयोग होने वाले उत्पादों में मौजूद नन्हे कण फेफड़ों पर अलग ही तरह से प्रभाव डालते हैं।



विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का कहना है कि सूक्ष्म कणों (नैनो पार्टिकल्स) का प्रयोग करने वाली निर्माण इकाइयों को इनकी जद में आने वाले कर्मचारियों पर पड़ने वाले प्रभावों का पता होना चाहिए। नैनो पार्टिकल्स एक मानव बाल की मोटाई से भी दस हजार गुणा छोटे कण होते हैं।



औद्योगिक इकाइयों में विभिन्न उत्पाद बनाने में प्रयोग किए जाने वाले रसायनों में मौजूद यह कण बेहद घातक होते हैं। यह कण सांस के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। हालांकि इनका उत्पादों में प्रयोग किए जाने के बाद इतना खतरा नहीं होता है। चूहों पर किए अध्ययन के दौरान देखा गया कि चार अलग तरह के सूक्ष्म कणों से फेफड़े क्षतिग्रस्त हुए।

10 साल बाद पकड़ में आई कम्प्यूटर की गलती, लाखों का अंगदान बेकार


लंदन. हमारे शरीर के किसी अंग से दूसरे को लाभ पहुंचे, यह मानते हुए ज्यादातर लोग अंगदान करते हैं। उनके घरवाले भी बाद में समझते हैं कि किसी का तो भला हुआ। ब्रिटेन जैसे अत्याधुनिक तकनीक वाले देश में एक-दो नहीं करीब 8 लाख लोगों का अंगदान लगभग बेकार हो गया।

महज कम्प्यूटर की गलती से। सरकार द्वारा गठित जांच आयोग के निष्कर्ष के अनुसार, खराब सॉफ्टवेयर की वजह से करीब 8 लाख लोगों के अंगदान के आवेदन में गलत अंग दर्ज हो गया। यह गलती एक-दो दिन या महीने नहीं बल्कि पूरे 10 साल तक किसी की पकड़ में नहीं आई। लोगों ने जिस अंग को दान करने की इच्छा जताई, वह कम्प्यूटर में गलत दर्ज हुआ। करीब 25 शवों में से गलत अंग निकाले जा चुके हैं।

कैसे हुआ

लोगों ने ड्राइवर एंड व्हीकल लाइसेंसिंग एजेंसी से लाइसेंस लेते समय आवेदन पत्र में अंगदान संबंधी कॉलम में अपनी इच्छाएं दर्ज की थीं। 1999 में यूके ट्रांसप्लांट ने इनमें से अंगदान संबंधी सूचनाएं ली थीं, लेकिन कम्प्यूटर में दर्ज करने को खराब सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया

चिप्‍स खाने से कैंसर होता है!


सभी स्‍नैक्‍स में चिप्‍स पहले नंबर पर है। क्‍योंकि बच्‍चा हो या बुढ़ा हर कोई चिप्‍स खाना चाहता है। लेकिन वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्‍लूएचओ) ने लोगों को अगाह किया है कि चिप्‍स में एक्रिलामाइड नामक रसायन पाया जाता है। एक्रिलामाइड रसायन को जब उच्‍च ताप पर पकाया जाता है तो यह कैंसर का कारण बन सकता है। चिप्‍स को कुरकुरा बनाने के लिए यह रसायन चिप्‍स में मिलाया जाता है।

न्‍यूजीलैंड के फूड स्‍टैंडर्ड डिपार्टमेंट ने इस संबंध में शोधकर इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे हैं कि कैंसर का एक बड़ा कारण चिप्‍स में एक्रिलामाइड रसायन का होना है। उन्‍होंने दुनिया भर के फूड इंडस्‍ट्री से अनुरोध किया है कि फूड में इस रासायन का इस्‍तेमाल न करें। क्‍योंकि यह भोजन को विषाक्‍त बनाता है।

इस रसायन का प्रभाव गर्मी के स्तर और खाना पकाने में लगने वाला समय पर निर्भर करता है। खाद्य सामग्री में इस रसायन का स्तर कम करने के कदम उठाए जा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञों का कहना है कि बीमारी से बचना है तो स्‍नैक्‍स से बचें। क्‍योंकि हर स्‍नैक्‍स में इसे किसी न किसी रूप में मिलाया जाता है। जो स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी गंभीर हालात पैदा कर सकता है।

दुनिया का अब तक का सबसे भीषण परमाणु विस्फोट !





मॉस्को.द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब शीतयुद्ध चरम पर था उस वक़्त विश्व की दो महाशक्तियां रूस और अमेरिका नए- नए हथियारों के परिक्षण में जुटी हुई थीं। मकसद साफ़ था दुनिया के सबसे भीषण हथियार को इजाद करना, इसी क्रम ने रूस ने एक ऐसे बम का अविष्कार किया जिसके बारे में सुन आज भी लोग सिहर उठते हैं।

जी हां रूस ने किया था दुनिया का सबसे विध्वंसक परमाणु बम परिक्षण। बमों के राजा कहे जाने वाले इस जार बम के विस्फोट से 50 मेगाटन टीएनटी के बराबर ऊर्जा निकली थी। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हिरोशिमा पर गिराया गए परमाणु बम की क्षमता मात्र 13 किलोटन के बराबर थी। वहीं बिग इवान नामक इस बम की संहारक क्षमता हिरोशिमा पर गिराए गए बम से करीब चार हजार गुना अधिक थी।

26.3 किलोमीटर तक सब तबाह

जार बम का परीक्षण 30 अक्टूबर 1961 को आर्कटिक द्वीपसमूह के नोवाया जेमलिया नामक स्थान पर किया गया था। बम के फॉयरवाल आकार 4.6 वर्ग किलोमीटर था और यह 26.3 वर्ग किलोमीटर के दायरे में आने वाली हर चीज को तबाह कर वहां एक गड्ढा बना दिया था। परीक्षण स्थल पर एक गहरी गर्त बन गई, जिसे आज भी सेटेलाइट से देखा जा सकता है।

अमेरिका को दिया था करार जवाब

अमेरिका के अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम के परीक्षण के जवाब में रूस ने यह परीक्षण किया था। पहले रूस की योजना 100 मेगाटन क्षमता का परमाणु परीक्षण करने की थी। परंतु तेज हवाओं द्वारा धूल के गुबार को उत्तरी रूस तक पहुंचने की आंशका के कारण विस्फोट की क्षमता घटाकर 50 मेगाटन कर दी गई। परमाणु धूल के आवासीय इलाकों तक पहुंचने के विनाशकारी परिणाम हो सकते थे।

कार जितना बड़ा था यह बम

जिस जार बम का परीक्षण किया गया उसका आकार एक कार जितना था। इसे ले जाने के लिए रूस के सबसे बड़ बमवर्षक विमान में बदलाव किया जाना था। जार बम को धीमी गति से गिरने वाले एक विशेष पैराशूट से गिराए जाने की योजना थी, जिससे विमान को बम विस्फोट से पहले वहां से हटने का पर्याप्त समय मिल जाए।

माउंट एवरेस्ट से करीब सात गुना ऊपर तक उड़ा धुआं

विस्फोट के बाद बम का फॉयरवाल आकाश में विमान की ऊंचाई तक पहुंच गया था। वहीं इससे उठने वाला धुआं माउंट एवरेस्ट से करीब सात गुना ऊपर 60 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था।

फोटोनिक्स यानी रिसर्च का हाईटेक क्षेत्र


फोटोनिक्स यानी प्रकाश का उपयोग कर सूचना को हासिल करना, आगे पहुंचाना और प्रोसेस करना। यह रिसर्च का हाईटेक क्षेत्र है। इसका विकास ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक्स के फ्यूजन से हुआ है। फिजिक्स की इस शाखा में फोटॉन यानी प्रकाश के मूल तत्व का अध्ययन होता है। लेसर गन, ऑप्टिकल फाइबर्स, ऑप्टोमेट्रिक इंस्ट्रुमेंट्स आदि पर रिसर्च भी इसी के तहत होती है।

फोटोनिक्स क्यों? : इस अगली पीढ़ी यानी 21वीं सदी की तकनीक माना जाता है। ठीक उसी तरह जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स को 20वीं सदी की तकनीक माना जाता है। हालांकि फोटोनिक युग की शुरूआत 60 के दशक में लेजर की खोज के साथ ही हो गई थी। इसने 70 के दशक में टेलिकम्युनिकेशन में अपना असर दिखाया। इसके नेटवर्क ऑपरेटर्स ने फाइबर ऑप्टिक्स डाटा ट्रांसमिशन का तरीका अपना लिया। इसीलिए काफी पहले ही गढ़ा जा चुका शब्द फोटोनिक्स आम प्रचलन में आया 80 के दशक में।

यह कहां प्रयोग होता है? : अभी कुछ सालों से टेलिकम्युनिकेशन, कंप्यूटिंग, सुरक्षा और कई अन्य प्रक्रियाओं में फोटोनिक्स का उपयोग आधारभूत तकनीक के रूप में होने लगा है। इससे न सिर्फ काम की स्पीड कई गुना बढ़ जाती है बल्कि वह प्रभावशाली भी हो जाता है। इसका उपयोग बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रोबायलॉजी, मेडिसिनल साइंस, सर्जरी और लाइफ साइंस में भी होता है। अब औद्योगिक उत्पादन, माइक्रोबायलॉजी, मेट्रोलॉजी में भी इसका उपयोग होने लगा है।

यह कोर्स कौन करे? : वही, जिसकी गहरी रुचि विज्ञान और इसकी बारीकियों में हो। इसकी गुत्थियां सुलझाने में मजा आता हो। फोटोनिक्स विशेषज्ञ के रूप में आप किसी फर्म में इंजीनियर, वैज्ञानिक और टेक्नीशियन का काम कर सकते हैं। किसी विश्वविद्यालय या शासकीय अनुसंधान विभाग में भी बतौर प्रोफेशनल ऑफीसर कॅरियर बना सकते हैं।

क्या गुण चाहिए? : विज्ञान से गहरा लगाव और फिजिक्स व मैथमेटिक्स में गहरी पकड़ की जरूरत है। इसके साथ चाहिए रचनात्मकता। यही गुण आपको बार-बार कुछ नया करने के लिए प्रेरित करेगा। बढ़िया कम्युनिकेशन स्किल भी काफी जरूरी है।

शैक्षणिक योग्यता : फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स विषय के साथ न्यूनतम 50 प्रतिशत अंकों से बारहवीं पास करने वाले छात्र फोटोनिक्स और ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स में ग्रेजुएट कोर्स करने के पात्र हैं। फिजिक्स, मैथ्स, एप्लाइड फिजिक्स या इलेक्ट्रॉनिक्स में ग्रेजुएट फोटोनिक्स या ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स में एमएससी कर सकते हैं। इस क्षेत्र में एमटेक, एमफिल या पीएचडी भी की जा सकती है। इनके लिए योग्यता होगी फिजिक्स या फोटोनिक्स में एमएससी। इसके अतिरिक्त कुछ डिप्लोमा कोर्स भी उपलब्ध हैं। इन्हें करके फोटोनिक्स टेक्नीशियन बना जा सकता है। ये कोर्स सामान्यतया दो साल की अवधि वाले होते हैं।

रोजगार के मौके : फोटोनिक्स में दक्ष लोगों की दुनिया भर में मांग है। इसका विशेषज्ञ इंजीनियर, टेक्नीशियन या टेक्नोलॉजिस्ट के तौर पर काम कर सकता है। सरकारी और औद्योगिक रिसर्च लैब में रिसर्च ऑफीसर बनने के भी खूब मौके हैं। उत्पादन, डिजाइन, सिस्टम्स, एप्लीकेशंस और डेवलपमेंट आदि क्षेत्रों में भी काम केभरपूर मौके हैं।

आकर्षक वेतन : शिक्षा और अनुभव के आधार पर वेतन कम-ज्यादा हो सकता है। शुरूआत में 20000 से 25000 रुपए मासिक वेतन मिलता है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों में फोटोनिक्स रिसर्चर या साइंटिस्ट का सालाना पैकेज 36000 से 1.17 लाख डॉलर यानी 16.50 लाख से 54.50 लाख तक होता है।

प्रमुख इंस्टीटच्यूट्स

>द इंटरनेशनल स्कूल ऑफ फोटोनिक्स कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, कोचीन-22, केरल
फोन: 484-2575396, 2577550, 2575848
वेबसाइट: photonics.cusat.edu, cusat.ac.in

>इंडियन इंस्टीटच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास
डिपार्टमेंट ऑफ फिजिक्स, इंडियन इंस्टीटच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास,
चेन्नई- 600036 फोन: 044-22574851
वेबसाइट: physics.iitm.ac.in

>मनीपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन,
मनीपाल-576104, कर्नाटक
फोन: 0820-2571978
वेबसाइट: admissions.manipal.edu

>इंडियन इंस्टीटच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली
डिपार्टमेंट ऑफ फिजिक्स,
दिल्ली-110016
फोन: 011-2659 1361
वेबसाइट: web.iitd.ac.in
optoelectronics/index.htm

>द डिपार्टमेंट ऑफ फिजिक्स, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी
द ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, कैनबरा एसीटी 0200, ऑस्ट्रेलिया
इंटरनेशनल टी: +61 261255111
वेबसाइट: photonics.anu.edu

Saturday, June 19, 2010


लंदन. फेसबुक पर यदि आपने मैसेज भेजने में जल्दबाजी की तो ध्यान रहे कि यह आपके ग्रुप के बाहर भी दिखाई पड़ सकती है। सर्च इंजन ओपनबुक ने एक नया सॉफ्टवेयर बनाया है, जो फेसबुक समेत सभी सोशल नेटवर्किग वेबसाइट पर डाले गए सार्वजनिक कंटेंट को ढूंढ़कर सामने ला सकता है।

इस सॉफ्टवेयर को फेसबुक की कथित सुरक्षित प्रायवेसी पॉलिसी की पोल खोलने के लिए बनाया गया है। अगर आप ओपनबुक पर बॉस, ड्रंक या इस जैसे कुछ खास की-वर्ड डालें तो पाएंगे कि ढेर सारे यूजर्स की निजी बातें सार्वजनिक हो गई हैं।

जानकारों की मानें तो फेसबुक पर अबसे आप अपनी पर्सनल बातें दूसरों से शेयर न करें तो ही बेहतर है

Wednesday, April 7, 2010

उग्रवादियों से निपटेगी भूत भगाने वाली मिर्चं


तेजपुर. असम में ‘भूत जोलोकिया’ यानी भूत भगाने वाली मिर्च अब उग्रवादियों से निपटेगी। इस मिर्च के पावडर को सुरक्षा बल हैंडग्रेनेड में विस्फोटकों के साथ इस्तेमाल करेंगे। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के वैज्ञानिकों ने इस मिर्च को मिलाकर और भी हथियार बनाए हैं। ‘भूत जोलोकिया’ से बने बमों को उग्रवादियों के छिपने के ठिकानों से बाहर निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। बम के फटने से पैदा हुए धुएं में मिर्च की तेज धमक रहेगी। इससे उग्रवादी बेहाल होकर गिर जाएंगे।

बृहस्पति जैसा ग्रह मिला


वाशिंगटन. एक फ्रांसीसी अंतरिक्ष यान ने सौरमंडल से परे करीब 1,500 प्रकाश वर्ष की दूरी पर बृहस्पति जैसे आकार वाला ग्रह ढूंढ़ा है। ‘नेचर’ जर्नल के मुताबिक, यह अंतरिक्ष यान नए ग्रहों की खोज के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक है- ‘कोरोट 9 बी’।

कोरोट 9 बी बृहस्पति की तुलना में कम द्रव्यमान का है। यह कोरोट-9 नामक तारे की परिक्रमा करता है। इस ग्रह व तारे की दूरी उतनी ही है जितनी कि सूर्य व बुध ग्रह की। नए ग्रह का द्रव्यमान बृहस्पति से करीब 85 फीसदी है। यह ग्रह सर्पेन्स कौडा नक्षत्र समूह से 1,500 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है।

कॉफी से चलेगी कार

थोड़ा अजीब सा लगता है, लेकिन विज्ञान के इस खेल में सब कुछ संभव है। ‘गो ग्रीन’ के उद्घोष के बीच पर्यावरण और प्राकृतिक ईंधन बचाने के हरसंभव उपाय किए जा रहे हैं। ऐसे में यह विचार भी कोई बुरा नहीं है। इस विचार को अमलीजामा पहनाने के लिए 1988 फॉक्सवैगन सिरोको मॉडल को चुना गया।

पूरा तामझाम फिट करने के बाद इस कार ने एस्प्रेसो के 56 कप गटककर एक मील का फासला तय किया। हालांकि इस तरह आया खर्च गैस से चलने वाली कारों की तुलना में कई गुना अधिक है, लेकिन है तो यह एक नया प्रयोग ही।


इस विचार का जन्म बीबीसी 1 के विज्ञान कार्यक्रम ‘बैंग गोज द थ्योरी’ के संदर्भ में हुआ। अब कॉफी से कार चलाने वाले ब्रिटेन के उत्साही शोधार्थियों का लक्ष्य मैनचेस्टर से लंदन के बीच 210 मील की दूरी नापने का है।

जीभ से देख सकेंगे दृष्टिहीन




लंदन. इराक की जंग में बम के टुकड़ों से दृष्टिहीन हुए लांस नायक क्रेग लुंडबर्ग को जीभ की मदद से देखने की शक्ति मिली है। यह कमाल है ब्रेन पोर्ट डिवाइस का।


इसमें दृष्टिहीन व्यक्ति को एक काला चश्मा पहनना पड़ता है, जिसमें कैमरा लगा होता है। उपकरण का दूसरा हिस्सा मुंह में रखकर उसे जीभ से स्पर्श कराना होता है। कैमरा सामने की तस्वीरों को विद्युतीय तरंगों में बदल देता है।


ये जीभ में कुछ खास तरह का अहसास पैदा करती हैं। इससे दिमाग आसपास की एक तस्वीर बना लेता है, जो लुंडबर्ग की दृष्टि का काम करती है। आने वाले दिनों में यह तकनीक हजारों दृष्टिहीनों के लिए नई रोशनी बन सकती है।

लेनोवो के मल्टी टच मॉनिटर




नई दिल्ली. लेनोवो कंपनी ने मल्टीटच एलसीडी स्क्रीन वाले मॉनिटर बाजार में पेश किए हैं।


इसमें एचडीएमआई पोर्ट, इंटीग्रेटेड स्पीकर्स, माइक्रोफोन, तीन यूएसबी पोर्ट, वेबकैम दिए गए हैं। 21.5 इंच से 23 इंच तक के इन मॉनिटर्स में 2एमपी तक वेबकैम सुविधा मिल सकती है।

हमारा शरीर बना मैसेजिंग डिवाइस

सिओल. वैज्ञानिकों ने मानव शरीर को कम्युनिकेशन इंटरफेस के रूप में इस्तेमाल करने में सफलता पाई है। कोरिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पहली बार एक व्यक्ति के हाथ में 30 सेंटीमीटर की दूरी पर दो इलेक्ट्रोड लगाकर 10 एमबी प्रति सेकंड की रफ्तार से इंटरनेट चलाया है।


काफी पतले ये इलेक्ट्रोड ब्लूटूथ जैसे वायरलैस लिंक के मुकाबले बहुत कम ऊर्जा की खपत करते हैं। शोधकर्ता सांग हून ली ने बताया कि इस तकनीक से 90 फीसदी कम ऊर्जा की खपत होती है। इंसान के तीन बाल जितने पतले इन इलेक्ट्रोड्स को आसानी से शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है।

हाथ के जीवाणुओं से होगी पहचान

वैज्ञानिकों का दावा है कि हर व्यक्ति के हाथों पर मिलने वाले जीवाणु फिंगर प्रिंट या डीएनए की तरह उनकी पहचान के लिए एक उपयोगी साधन हो सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि उंगलियों और हाथों पर मिलने वाले कुछ जीवाणु ही सबसे में पाए जाते हैं. और तो और एक समान डीएनए वाले जुड़वा लोगों के हाथों पर भी अलग-अलग जीवाणु पाए जाते हैं. बीबीसी के विज्ञान संवाददाता मैट मैकग्रा के मुताबिक़...

Saturday, April 3, 2010

गूगल ला रहा है एंड्रॉइड सेटटॉप बॉक्स

न्यूयॉर्क. गूगल ने डिश के साथ मिलकर एंड्रॉइड प्लेटफार्म से चलने वाले टेलीविजन सेटटॉप बॉक्स लाने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके बाजार में आने के बाद टीवी दर्शकों को यू-ट्यूब, मेटाकैफे और इंटरनेट पर उपलब्ध कई मीडिया चैनलों के उपयोग करने का मौका मिलेगा।



इससे दर्शक अपने पसंदीदा गानों और वीडियो की सूची बनाने के बाद टीवी में अलग से की-बोर्ड जोड़कर इंटरनेट व अन्य कार्यक्रमों का भी आनंद ले सकेंगे। गूगल ने यह सेवा लोगों को मुफ्त देने के बदले इनमें विज्ञापनों के जरिए पैसा कमाने की योजना बनाई है।

सिकुडता जा रहा है मानव का मस्तिष्क

नयी दिल्ली. मानव का मस्तिष्क सिकुडता जा रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य की दिमागी क्षमता में कमी हो रही है बल्कि उसका मस्तिष्क सिकुडते कम्प्यूटर की तरह ज्यादा कुशल बनता जा रहा है।

फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने 1868 में पेरिस के दोर्दान में एक गुफा से पांच पुराने कंकालों के बीच मिली बीस हजार साल पुरानी एक खोपडी की अनुकृति का अध्ययन करने के बाद बताया है कि यह वर्तमान

मनुष्य की खोपडी से 20 प्रतिशत तक बडी है।



यह खोपडी क्रो मैगनन मानव प्रजाति से संबंधित थी। यह फ्रांस के राष्ट्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय में रखी हुई है। वैज्ञानिक दल ने इसकी अनुकृति तैयार की है। जिसके बारे में उनका दावा है कि यह आधुनिक युग के प्रारंभिक मानव की खोपडी की अब तक की सर्वश्रेष्ठ अनुकृति है।



वैज्ञानिकों का कहना है कि खोपडी के बडे होने का यह मतलब नहीं है कि मनुष्य के पूर्वज ज्यादा बुद्धिमान थे। अध्ययनों से पता लगा है कि मस्तिष्क के आकार और आर्ईक्यू, सामान्य बुद्धिमत्ता, के बीच बहुत मामूली संबंध होता है। वैज्ञानिकों के इस शोध से मानव विकास के एक महत्वपूर्ण सवाल पर रोशनी पड सकती है कि यदि मनुष्य का मस्तिष्क सिकुडता जा रहा है तो इसकी वजह क्या है।



यह सवाल विशेषज्ञों को परेशान करता रहा है और इस पर उनके बीच मतभेद हैं। समझा जाता है कि यह खोपडी किसी सुगठित अधेड व्यक्ति की है, जो लगभग छह फुट लंबा था। इस खोपडी के बारे में दुनिया भर के वैज्ञानिक पहले से ही जानते हैं लेकिन जल्दी ही यह और प्रसिद्ध हो जाएगी।



जब वाशिंगटन में अमरीका के राष्ट्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय में इसकी अनुकृति को प्रदर्शित किया जाएगा। पेरिस के कुइंज विंग्ट्स अस्पताल में खोपडी के आंतरिक भाग का स्कैन करके इस अनुकृति को तैयार किया गया था ताकि मस्तिष्क से तंत्निका कपाल, न्यूरोक्रैनियम, पर पडे प्रभाव की तस्वीर ली जा सके।

पच्चीस साल का हुआ डॉट कॉम

इंटरनेट की दुनिया में आज का दिन काफ़ी अहम है. अहम इसलिए क्योंकि आज डोमेन नेम डॉट कॉम की 25वीं सालगिरह है। आज से ठीक 25 साल पहले 15 मार्च 1985 को कंप्यूटर बनाने वाली एक कंपनी सिम्बॉलिक्स ने अपने नाम में डॉट कॉम जोड़ा था।
और आज 25 साल बाद क़रीब-क़रीब एक लाख डॉट कॉम वेबसाइट्स हर दिन रजिस्टर्ड होती हैं। बीबीसी के तकनीकी मामलों के संवाददाता मैगी शिल्स का कहना है कि 80 के दशक के आख़िर और 90 के दशक के शुरू में इक्का-दुक्का ही ये जानता था कि ये डॉट कॉम क्या है। लेकिन आज डॉट कॉम हमारे जीवन का हिस्सा है और इंटरनेट की दुनिया में मील का पत्थर।

विकास

आज लोग डॉट कॉम की दुनिया में गोते लगाकर शॉपिंग कर सकते हैं, मनोरंजन कर सकते हैं, नई चीज़ें सीख सकते हैं, विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं, छुट्टियों की योजना बना सकते हैं और भी बहुत कुछ कर सकते हैं।


वर्ष 1985 में सिर्फ़ छह डॉट कॉम डोमेन नेम रजिस्टर हुए थे। आज क़रीब आठ करोड़ 60 लाख सक्रिय वेबसाइट्स हैं और 11 करोड़ 30 लाख वेबसाइट्स आईं और गईं। वर्ष 1997 तक डॉट कॉम डोमेन नेम का आँकड़ा 10 लाख भी नहीं पहुँचा था। लेकिन इसी साल इंटरनेट के क्षेत्र में आई उछाल ने तस्वीर बदल कर रख दी।
इसी के साथ डॉट कॉम की दुनिया में भी धमाका हुआ और अगले दो साल में क़रीब दो करोड़ डोमेन नेम रजिस्टर हुए। डॉट कॉम डोमेन नेम की निगरानी करने वाली कंपनी वेरीसाइन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क मैकलॉगलिन का कहना है कि दरअसल हम इंटरनेट का जश्न मना रहे हैं और डॉट कॉम इंटरनेट का चर्चित और जाना-पहचाना चेहरा है। 25 साल पहले किसने कल्पना की थी कि इंटरनेट आज ऐसी स्थिति में होगा। मैकलॉगलिन का मानना है कि इंटरनेट के इस्तेमाल में नित-नए बदलाव हो रहे हैं और आने वाले दिनों में इसमें और बदलाव होंगे।

अब बोतल में ताजी हवा

लंदन. airशहरवासियों में बढ़ रहे तनाव को अब बोतलबंद हवा कम करेगी। बोतलबंद हवा पेश करने वाले नेशनल ट्रस्ट का मानना है कि हवा का हर जार कम से कम दस मिनट का तनाव खत्म करेगा। ब्रिटेन के समुद्री किनारों और ग्रामीण क्षेत्रों की यह हवा तमाम खुशबुओं में उपलब्ध होगी।



खुले स्थानों और ऐतिहासिक भवनों की रक्षा में लगे नेशनल ट्रस्ट के प्रवक्ता एंड्रू मैक्लिन के अनुसार बोतलों में बंद यह ताजी हवा देश के कुछ पसंदीदा स्थानों से उपलब्ध कराई जाएगी। ट्रस्ट को बोतलबंद हवा का विचार एक सर्वे के बाद आया। इस सर्वे के मुताबिक 60 फीसदी लोगों का मानना है कि ताजी हवा में सांस लेना उनके तनाव को काफी कम कर देता है। सर्वे में शामिल 72 फीसदी लोगों का मानना है कि समुद्री किनारे की हवा उनके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है।

फेसबुक पर ‘पैनिक बटन’ लगाने का दबाव

facebookलंदन. ब्रिटेन की सरकार सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक पर दबाव डाल रही है कि वह अपने वेब पेजेस पर एक ‘पैनिक बटन’ उपलब्ध कराए। ताकि बच्चे किसी तरह का खतरा महसूस होने पर इसका इस्तेमाल कर तुरंत पुलिस की मदद मांग सकें।

सरकार ने यह कदम एक व्यक्ति द्वारा फेसबुक पर मिली एक किशोरी की हत्या के बाद उठाया है। आरोपी पीटर चैपमेन ने 17 वर्षीय एशलीघ हाल से दोस्ती करने के लिए फेसबुक पर अपनी गलत पहचान बताई थी। इसके बाद उसने एशलीघ का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म करने के बाद हत्या कर दी। सत्तारूढ़ लेबर पार्टी के उपनेता हैरिएट हरमन ने कहा कि इस घटना के बाद से ही फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किग साइटों को पैनिक बटन उपलब्ध कराने के लिए कहा जा रहा है।

एमएसएन लाएगा फ्री ऑनलाइन वीडियो

Bhaskarबीबीसी के आई-प्लेयर और चैनल फोर के ऑन डिमांड सर्विस के मुकाबले माइक्रोसॉफ्ट फ्री ऑनलाइन वीडियो सुविधा की शुरुआत करेगा। इसमें यूजर्स को कुछ कॉमेडी शो और लोकप्रिय धारावाहिकों को मुफ्त देखने की छूट दी जाएगी। हालांकि एमएसएन का यह भी कहना है कि इसेक बदले यूजर्स को शो की शुरुआत से लेकर बीच-बीच में कई विज्ञापन भी झेलने होंगे। वीडियो को लोकप्रिय बनाने के लिए एमएसएन कई धारावाहिक निर्माताओं और फिल्म कंपनियों से करार करने की कोशिश कर रहा है। एमएसएन ने कहा कि इस ऑनलाइन वीडियो सेवा को माइक्रोसॉफ्ट के गेमिंग कंसोल एक्सबॉक्स 360 से जोड़ने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

कर्मचारियों पर नजर रखेगी नई तकनीक

cellजापान की एक फोन कंपनी ने एक ऐसी तकनीक बाजार में पेश की है, जिसके जरिए बॉस अपने कर्मचारियों के मोबाइल फोन कॉल्स पर नजर रख सकेगा। केडीडीआई कॉपरेरेशन की इस तकनीक में एक कैमरा कर्मचारियों के मोबाइल फोन कॉल्स की संख्या को ट्रैक करेगा। कैमरा यह देखेगा कि कर्मचारी को कितने कॉल्स आते हैं और वह कितनी बार अपनी सीट से उठकर उन्हें अटैंड करने बाहर जाता है। यह जानकारी कंपनी के मुख्यालय को भेजी जाएगी। केडीडीआई कंपनी के अधिकारियों ने दावा किया कि नई तकनीक से कर्मचारियों के व्यवहार का बेहतर तरीके से आकलन किया जा सकेगा। इसके अलावा उनके कामकाज को भी बेहतर बनाया जा सकेगा।

हाई-टेक होंगे भविष्य के टॉयलेट

toiletजापान के कुछ अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट में ऐसे हाई-टेक टॉयलेट लगाए गए हैं, जो किसी स्टारशिप के पायलट की सीट से कम नहीं हैं। इनमें मोशन सेंसर फ्लश, ऑटोमेटिक कंट्रोल पैनल, डीऑडोराइजिंग फीचर्स, खास साउंड इफेक्ट्स जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं होंगी। इसके अलावा इसमें हीटेड व सेल्फ क्लीनिंग सीट्स सुविधा भी होगी। ये टॉयलेट पूरी तरह से पेपरलेस होंगे।

आप क्या सोच रहे हैं, बताएगा टेलीपैथी कम्प्यूटर

नयी दिल्ली. अब आपके विचार गोपनीय नहीं रहे। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा टेलीपैथी कम्प्यूटर विकसित करने में कामयाबी हासिल कर ली है, जिससे यह पता लगाया जा सकता है कि व्यक्ति क्या सोच रहा है।

व्यक्ति के मस्तिष्क के स्कैन के दौरान इस कम्प्यूटर के जरिए उसके विचारों की बनावट का मतलब निकालकर बताया जा सकता है कि उसके दिमाग में क्या विचार उठ रहे हैं। इस नये अनुसंधान को पिछले साल किए गए अध्ययन का अगला कदम माना जा सकता है।



जब इन्हीं शोधकर्ताओं ने एक कमरे के आसपास एक व्यक्ति की गतिविधियों का पता लगाने के लिए इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया था। लेकिन नये शोध में जो कम्प्यूटर विकसित किया गया है, वह व्यक्ति की स्मृतियों को पता लगाने के साथ ही विभिन्न स्मृतियों के बीच फर्क भी बता सकता है।

करेंट बायलोजी में आनलाइन प्रकाशित यह अध्ययन हिप्पोकैम्पस पर केन्द्रित किया गया। हिप्पोकैम्पस दिमाग के बीच में एक ऐसा स्थान है जो अल्पावधि स्मृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

टेलीपैथी कम्प्यूटर से लाई डिटेक्टर, झूठ का पता लगाने वाला यंत्न, के क्षेत्न में संभावनाएं बढ गई हैं क्योंकि यह स्मृतियों की युक्तियों का पता लगाने की दिशा में भी मार्ग प्रशस्त कर सकता है। जैसा कि 'द ईटर्नल सनशाइन आफ द स्पाटलेस माइंड' फिल्म में दिखाया गया है।

अब आप गूगल पर आवाज से भी कर सकेंगे सर्च


और हिंदी में सर्च करने के बाद अब गूगल पर आवाज से सर्च किया जा सकेगा। इसका फायदा वो लोग भी उठा सकेंगे जो न तो हिंदी में सर्च कर सकते हैं और न अंग्रेजी में। गूगल इंडिया के उत्पाद प्रबंधक जगजीत चावला ने यहां कहा कि मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले गूगल में जाकर जो कुछ भी कहेंगे, वह सर्च होकर सामने आ जाएगा। यह बात अन्य भारतीय भाषाओं में भी कही जा सकती है।



उन्होंने कहा कि इंटरनेट ने भारत में सात करोड़ लोगों के जीवन को छुआ है। इनमें 13 प्रतिशत लोग अंग्रेजी जबकि बाकी हिंदी व अन्य भाषाओं में इसका उपयोग पसंद करते हैं। इस सुविधा से एक बड़ा वर्ग इंटरनेट का लाभ ले सकेगा।

दीवारों के आर-पार देख सकेगा मोबाइल

bhaskarसिडनी. यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित किया है, जो एक्स-रे के सहारे यह पता लगा सकता है कि दीवार से दूसरी ओर कौन है और वहां क्या हो रहा है। सॉफ्टवेयर के विकासकर्ता क्रिश्चियन सेंडोर ने कहा कि यह एप्लीकेशन फोन के कैमरे के साथ मिलकर काम करता है। इसे डाउनलोड करने के बाद यूजर जब किसी बिल्डिंग की ओर कैमरा घुमाएगा तो उसे उसके अंदर हो रही गतिविधि के बारे में थ्री-डी तकनीक के जरिए सारी जानकारी मिल जाएगी। सॉफ्टवेयर के निर्माताओं ने इस तकनीक के उपयोग के लिए नोकिया कंपनी के साथ समझौता किया है। कंपनी अगले दो साल में इसे बाजार में पेश करेगी।

थ्री-डी टीवी बनाएंगे सोनी, सैमसंग


bhaskarटोक्यो. थ्री-डी तकनीक इसी साल से टेलीविजन में भी प्रवेश कर जाएगी। सोनी और सैमसंग ने इसका ऐलान कर दिया है। सोनी इस साल ढाई करोड़ एलसीडी टीवी बाजार में लाएगी, जिनमें से 10 फीसदी थ्री-डी तकनीक से लैस होंगे। इसके अलावा सोनी ने थ्री-डी गेम सॉफ्टवेयर भी पेश करने की योजना बनाई है। सैमसंग ने 46 और 55 इंच आकार वाले थ्री-डी टीवी अगले कुछ महीनों में लाने का घोषणा की है। थ्री-डी टीवी की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही फिल्म व धारावाहिकों के निर्माता तेजी से एनीमेशन तकनीकों की ओर मुड़ेंगे। अब देखना यह है कि एचडीटीवी तकनीक वाले टीवी खरीदने वाले अपने सेट को अपडेट करने को कितने तैयार होते हैं।

अब आया 3-डी अख़बार

ला डार्नियर पढ़ता एक व्यक्ति
अब तक आप केवल 3-डी फ़िल्मों और वीडियो गेम के बारे में ही सुनते आए होंगे लेकिन अब एक अख़बार ने भी 3-डी अंक प्रकाशित करने का प्रयोग किया है.
बेल्जियम में फ़्रेच भाषा में छपने वाले एक अख़बार ने यूरोप का पहला 3-डी (त्रिआयामी ) अंक प्रकाशित किया है.
अख़बार ला डार्नियर ह्यूर (डीएच) ने अपने इस विशेषांक के सभी फ़ोटो और विज्ञापन को थ्रीडी प्रारूप में प्रकाशित किया है. लेकिन इसकी शेष सामग्री सामान्य है.
अख़बार के इस विशेषांक को मोटे कागज़ से बने हुए चश्मे की मदद से देखा जा सकता है.

महंगा अख़बार

ला डार्नियर ह्यूर के संपादक कहना है कि इस 3-डी अंक की लागत को देखते हुए इस तरह के और अंक छापे जाने की कोई योजना नहीं है.
फ़्रांस के विश्लेषकों ने अख़बार के इस साहसिक क़दम को सलाम किया है लेकिन कहा है कि यह अभी यह पूरी तरह दोषरहित होने से काफ़ी दूर है.



अख़बार के संपादक ह्यूबर्ट लेकलर्क ने बताया कि इस विशेषांक को तैयार करने में दो महीने का समय लगा. यह सामान्य अख़बार की एक लाख 15 हज़ार प्रतियों के छापने में लगने वाले समय से बहुत अधिक था.
लेकलर्क ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया, ''हमने 3-डी सिनेमी, टीवी और वीडियो गेम के बारे में सुना था इसलिए हमने यह चुनौती स्वीकार की.''
पीसी वर्ल्ड के फ़्रेच संस्करण के मुतबिक़ आँखों से 50 सेंटीमीटर की दूरी पर रखकर पाठक इसे आसानी से देख सकते हैं.
इसके मुताबिक़ ''केवल कुछ मिनटों में ही आँखें थ्री डी तस्वीरों को देखने की अभ्यस्त हो जाती हैं. इसके लिए किसी विशेष तरह के चश्मे की ज़रूरत नहीं होती.''
पीसी वर्ल्ड के मुताबिक़ कुछ तस्वीरों, ख़ासकर विज्ञापनों में अच्छा 3-डी प्रभाव है लेकिन बाकी की तस्वीरें अस्पष्ट हैं या उनको देखना कठिन है.

इंटरनेट तक पहुंच को मिले मौलिक अधिकार का दर्जा

bhaskarलंदन. इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर अब दुनिया भर में इस तक पहुंच को मौलिक अधिकार बनाने की मांग जोरदार ढंग से उठने लगी है। बीबीसी वल्र्ड सर्विस के लिए ग्लोब स्कैन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से यह नतीजा सामने आया है। यह सर्वेक्षण भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको और नाइजीरिया सहित 26 देशों में हुआ। इसमें 27,000 लोगों ने भाग लिया था।



सर्वेक्षण में 87 फीसदी लोगों ने नेट तक पहुंच को मौलिक अधिकार का दर्जा देने की मांग का समर्थन किया है। इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (आईटीयू) के महासचिव डॉ. एच टूरे का मानना है कि अभिव्यक्ति के अधिकार की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। इंटरनेट ज्ञानवर्धन का अब तक का सबसे प्रभावी साधन है। हम एक ज्ञानवान समाज का हिस्सा हैं और सबको नेट तक पहुंच सुलभ होनी चाहिए।



सर्वेक्षण में शामिल ज्यादातर लोगों का मानना है कि नेट ने उन पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। पांच में से चार लोगों का मानना है कि इसने उन्हें आजादी दी है। उल्लेखनीय बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने भी वैश्विक स्तर पर नेट तक पहुंच बनाने की वकालत की है।

अब आपका दरवाजा खोलेगा एप्पल-की

लंदन. आने वाले दिनों में आपकी कार, बाइक और आपके घर के सभी दरवाजे एक ही चाबी से खुलेंगे। एप्पल ने एक क्रांतिकारी इलेक्ट्रॉkeyनिक उपकरण बनाया है। इसे दरवाजे के एक तरफ लगाकर आप चैन की नींद सो सकते हैं। डिवाइस में एक यूनीक पिन कोड होगा। इसे दबाकर और इलेक्ट्रॉनिक चाबी को उपकरण के सामने लहराकर आप दरवाजा खोल सकेंगे। एप्पल को फिलहाल अपने इस नए उपकरण के पेटेंट का इंतजार है। कंपनी इस तकनीक को आने वाले दिनों में अपने आईफोन पर भी इस्तेमाल कर सकती है। तब आपका मोबाइल फोन ही दरवाजा खोलने के लिए काफी होगा।

वाहन चोरी से निपटेगा पीडीए


हैदराबाद. शहरों में गाड़ियों की चोरी एक बड़ी समस्या है। सड़कों पर तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी किसी गाड़ी को देखकर यह नहीं जान पाते कि वह चोरी की है या नहीं। अब ऐसी सभी चोरी की गाड़ियों के नंबर का डेटाबेस बनाया जा रहा है। डीजीपी ऑफिस में बन रहे इस डेटाबेस को पुलिसकर्मियों के पीडीए पर शिफ्ट किया जाएगा। इससे वाहनों की चेकिंग के समय वे पीडीए पर नंबर का मिलान करेंगे। संदिग्ध या चोरी की गाड़ी होने पर पीडीए अलार्म बजाएगा। इससे उन्हें वाहन चोरों को पकड़ना आसान हो जाएगा। पीडीए में ई-चालान फार्म डालने की भी योजना है, ताकि पुलिस को रसीद-कट्टे से छुटकारा मिले।

मंगल के रहस्यों को उजागर करती कुछ एक्सक्लूसिव तस्वीरें





ये तस्वीरें किसी कलाकार के मन की उपज नहीं, बल्कि प्रकृति की कलाकारी के अनोखे उदाहरण हैं। इन चित्रों को देख कर ऐसा लगता है कि प्रकृति ने ब्रश लेकर कैनवास पर जादू बिखेर दिया है। ये तस्वीरें मंगल ग्रह की हैं जहां तक पहुंच पाना अभी मनुष्य जाति के लिए संभव नहीं हो सका है।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह की अनोखी सुंदरता को कैमरे में कैद करने में सफलता हासिल कर ली है। ये तस्वीरें नासा के अंतरिक्ष यान मार्स रिकोनाइजर ऑरबिटर से ली गई हैं। नासा ने इस यान से भेजी गई 11,762 तस्वीरों को सर्वाजनिक किया है। इन तस्वीरों में दिख रही नीली आभा बेसल्ट चट्टानों और कार्बन डाईऑक्साइड से बने बर्फ के कारण है।




अंतरिक्ष यान ने यह सफलतानासा ने मंगल ग्रह की अनोखी सुंदरता को कैमरे में कैद करने में सफलता हासिल कर ली है। ये तस्वीरें नासा के अंतरिक्ष यान मार्स रिकोनाइजर ऑरबिटर से ली गई हैं। नासा ने इस यान से भेजी गई 11,762 तस्वीरों को सर्वाजनिक किया है। इन तस्वीरों में दिख रही नीली आभा बेसल्ट चट्टानों और कार्बन डाईऑक्साइड से बने बर्फ के कारण है।


अंतरिक्ष यान ने यह सफलता अपनी यात्रा के चौथे साल में हासिल की है। इसे 12 अगस्त 2005 को फ्लोरिडा से लॉन्च किया गया था। ताकि मानव मिशन की तैयारियों के लिए जानकारी इकट्ठा की जा सके, जिसमें यह काफी हद तक कामयाब रहा है। मंगल पर मानव भेजने में लगे वैज्ञानिकों को इन तस्वीरों से बहुत मदद मिलने की उम्मीद है। अपनी यात्रा के चौथे साल में हासिल की है। इसे 12 अगस्त 2005 को फ्लोरिडा से लॉन्च किया गया था। ताकि मानव मिशन की तैयारियों के लिए जानकारी इकट्ठा की जा सके, जिसमें यह काफी हद तक कामयाब रहा है। मंगल पर मानव भेजने में लगे वैज्ञानिकों को इन तस्वीरों से बहुत मदद मिलने की उम्मीद है।




जेब में समा जाए की-बोर्ड


आरआईआई मिनी वायरलैस की-पैड कई खूबियों वाला है। इसमें 2.4 गीगाहट्र्ज वायरलैस यूएसबी डोंगल लगा है। इससे आप इसे अपने कंप्यूटर और स्मार्टफोन दोनों से जोड़ सकते हैं। इसमें एक टचपैड भी है, जो आपके लिए माउस का काम करेगा। इसकी कीमत 92 डॉलर (4324 रु.) है।

तीन साल बाद बेकार हो जाएगा डेस्कटॉप


लॉस एंजिलिस. गूगल ने दावा किया है कि अगले तीन साल में डेस्कटॉप कंप्यूटर दुनियाभर में लगभग गायब ही हो जाएंगे। कंपनी ने यह बात मोबाइल कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी में हो रहे विकास कार्र्यो को ध्यान में रखते हुए कही है। गूगल समेत अधिकांश कंपनियां इस समय मोबाइल फोन को ही कंप्यूटर की शक्ल देने में लगी हैं। गूगल का एंड्रॉइड प्लैटफॉर्म जल्द ही ऑपरेटिंग सिस्टम की जगह लेने वाला है। इसी तरह कंपनी का क्रोम वेब ब्राउजर भी इस साल के आखिर में ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में बाजार में आएगा। कंपनी का कहना है कि इन तकनीकी बदलावों के बाद मोबाइल फोन या आईपैड जैसे कंप्यूटरों पर भी डेस्कटॉप जितने काम किए जा सकेंगे।

आतंक के खिलाफ नाक होगी मददगार एजेंसी


लंदन ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जंग में एक नया हथियार तलाशा है। यह हथियार आदमी की नाक है। बाथ विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने नाक की बनावट का अध्ययन करने के लिए एक नई तकनीक विकसित की है।


विशेषज्ञों का दावा है कि इससे गैरकानूनी आव्रजकों, आतंकवादियों और अपराधियों की पहचान करने में मदद मिलेगी। हाई टैक स्कैनर वाली इस तकनीक को फोटो फेस के नाम से जाना जाता है। नाक पर अनुसंधान करने वाले डॉ. एड्रिअन इवैन का ने यह दावा किया है।


कैसे करेगी काम :


किसी आदमी की नाक की चार तस्वीरें विभिन्न कोणों से ली जाएगी। उसके बाद नाक की बनावट का तुलनात्मक विश्लेषण छह मुख्य आकारों रोमन, ग्रीक, नूबियन, हॉक, स्नब और टर्न अप से की जाएगी। इसके बाद हर नाक की जांच एक कंप्यूटर साफ्टवेयर की मदद से की जाएगी। सबसे ऊपरी हिस्से जहां भवें मिलती हैं, नाक अग्र हिस्से का विश्लेषण किया जाएगा।
कि आइरिस और फिंगरप्रिंट स्कैन से पहचान करने से कहीं ज्यादा नाक के आधार पर पहचानना है।

Friday, April 2, 2010

सिनेमा आपकी जेब में


लंदन. आईफोन पर वीडियो शूट करने के बाद उसे बड़े परदे पर देखना बड़ा सुखद है। इसमें आपकी मदद करेगा मिली आईफोन प्रोजैक्टर। यह वीडियो, फोटो और पॉडकास्ट को 70 इंच की स्क्रीन पर दिखाएगा। यूएसबी के जरिए मोबाइल से कनैक्ट कर आप बड़े परदे पर डेढ़ घंटे तक फिल्म देख सकते हैं। इस साल के अंत तक इसे दुनियाभर के बाजार में पेश किया जाएगा।

पिकनिक’ की मदद से ऑनलाइन एडिट करें फोटो


सैन फ्रांसिस्को. ऑनलाइन फोटो शेयरिंग के लिए अमूमन फोटो शॉप या ऐसे किसी सॉफ्टवेयर की मदद लेनी पड़ती है। यूजर्स के लिए यह बड़ा सिरदर्द है, क्योंकि उन्हें यह मालूम नहीं होता कि उनकी फोटो भेजने के उपयुक्त है या नहीं। गूगल ने ऑनलाइन फोटो एडिटिंग साइट पिकनिक का अधिग्रहण कर यूजर्स की समस्या सुलझा दी है। अब आप पिकनिक पर अपने सारे फोटो ऑनलाइन एडिट कर सकेंगे। आपको पिक्सेल और साइज आदि के बारे में गाइडलाइन भी मिलेगी। फोटो की फिनिशिंग और बैकग्राउंड के लिए भी वैबसाइट ऑनलाइन सलाह उपलब्ध कराएगा। गूगल से जुड़ने के बाद इस वैबसाइट की उपयोगिता बढ़ जाएगी।

गूगल क्रोम के जरिए कीजिए वैबसाइट का ट्रांसलेशन


वॉशिंगटन. गूगल का नया वेब ब्राउजर क्रोम दो नए फीचर्स के साथ सामने आया है। एक तो इसमें प्रायवेसी कंट्रोल लगाया गया है, साथ ही यह अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं की वैबसाइटों को अपने आप ट्रांसलेट भी कर सकता है। इसके लिए यूजर को पहले ही यह बताना होगा कि वह जो भी साइट खोलेगा, उसके हर वेब पेज को किस भाषा में अनुवाद करना है तभी उसे सही तरीके से मदद मिल पाएगी। गूगल क्रोम में संबंधित देश विशेष के हिसाब से ऐसे कई फीचर्स पहले ही जोड़े गए हैं, जिनकी बदौलत विदेशी पर्यटकों को उस देश के बारे में जानने, शॉपिंग, मुद्रा के परिवर्तनीय मूल्य आदि के बारे में मदद मिलती है।
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फेसबुक, ट्विटर खोलेगा आपके राज


लंदन. आपने यदि फेसबुक, ट्विटर या ऑकरुट पर अपने प्रोफाइल में मूल फोटो भी लगाया हुआ है, तो समझिए आपका राज खुल गया। इससे कोई भी अपने मोबाइल पर आपकी तस्वीर खींचकर नाम, फोन नंबर और यहां तक कि घर का पता भी जान सकता है। यह कमाल एक नए सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन का है। इसे अपने मोबाइल में डाउनलोड कर आप किसी भी अजनबी शख्स की तस्वीर खींचने के बाद महज एक बटन दबाने पर उसकी सारी जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं। यह एप्लीकेशन पांच मेगापिक्सल वाले कैमराफोन में ही काम करता है। इसे बनाने वाले ऑक्सफोर्ड इंटरनैट इंस्टीच्यूट के डॉ. ईयान ब्राउन कहते हैं कि प्रायवेसी सुरक्षित रखनी हो तो उसे सोशल नैटवर्किग साइटों पर जानकारियों को निजी रखना चाहिए।

‘स्किनपुट’ कलाई को बना देता है टचस्क्रीन


न्यूयॉर्क. अब मोबाइल टचस्क्रीन का जमाना पुराना होने जा रहा है। वैज्ञानिक, मानव शरीर को ही मोबाइल की स्क्रीन के तौर पर उपयोग करने के लिए ‘स्किनपुट’ नाम काएक गैजेट तैयार कर रहे हैं। इस गैजेट को कलाई में घड़ी की तरह पहना जाएगा। इसके बाद आपका हाथ, बाजू और शरीर के कई अंग मोबाइल की टचस्क्रीन की तरह काम करेंगे।


माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च और कॉर्नेज मेलन यूनिवर्सिटी के कुछ वैज्ञानिक इस प्रोजेक्ट पर एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इस गैजेट के साथ ही एक मिनी प्रोजेक्टर लगा है। इसमें लगा विशेष सेंसर आपको बताएगा कि कलाई के कौन से हिस्से को थपथपाना है।


वर्तमान में ध्वनि डिटेक्टर की सहायता से रिसर्चरों ने त्वचा के पांच हिस्सों को खोजा है, जो स्मार्टफोन प्रोग्राम एप्लीकेशन के रूप में स्कीन टचस्क्रीन का काम कर सकते हैं। रिसर्चरों का मानना है कि स्किनपुट गैजेट चलते और दौड़ते समय अधिक अच्छा काम करता है। जिन २२ सहायकों पर यह टेस्ट किया गया है उनका मानना है कि इस गैजेट की सहायता से शरीर के अंगों को ही टचस्क्रीन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। टीम इस रिसर्च को अप्रैल महीने में ‘कंप्युटर-ह्युमन इंटरेक्शन मीटिंग’ अटलांटा (जियोर्जिया) में प्रस्तुत करने की योजना बना रहे हैं।

अनुमान से पहले अस्तित्व में आए थे डायनासोर


लंदन. डायनासोरों के बारे में जितना सोचा जाता है, वे उससे भी कई साल पहले अस्तित्व में आए थे। एक नए शोध में यह पता चला है। जीवाश्म विज्ञानियों ने अपने शोध में प्रागैतिहासिक जीवों के चार टांगों वाले पूर्वज के जीवाश्म पाए हैं। ये जानवर 25 करोड़ साल पहले पाए जाते थे। यह डायनासोर के अस्तित्व से एक करोड़ साल पहले का समय है।


ऐसा माना जाता है कि मीट खाने वाले इन जानवरों का डायनासोर से वही रिश्ता है, जैसा बंदरों का मानवों से है। पूर्वी अफ्रीका के शहर तंजानिया में मिले इन जीवाश्मों का आकलन करने वाले वैज्ञानिकों ने इन जीवों को ‘प्रोटोसोर’ नाम दिया है। शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि डायनासोर और उनके करीबी रिश्तेदार जैसे कि पटेरोसोर्स और पटेरोडैकटाइल्स भी अनुमानित से काफी समय पहले अस्तित्व में आए होंगे।


इस नई प्रजाति एसिलसोर्स नोग्वे का वर्णन टैक्सास यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. स्टर्लिग नेसबिट ने नेचर पत्रिका में किया है। एसिलसोर्स डायनासोरों का ही एक समूह है जिसे सिलेसोर्स कहा जाता है। सिलेसोर्स को डायनासोर्स जैसा माना जाता है क्योंकि इनकी काफी विशेषताएं उनके जैसी होती हैं, हालांकि इनमें वे प्रमुख विशेषताएं नहीं होती, जो सभी डायनासोरों में पाई जाती हैं।

मुसोलिनी को हरा सकते हैं बलरुस्कोनी


इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बलरुस्कोनी पूर्व तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। दरअसल यहां बात आइफोन एप्लिकेशन की हो रही है। अब बर्लुस्कोनी पर आधारित एप्लिकेशन बाजार में आ गई है और लोग इसे पसंद कर रहे हैं। एप्पल आइफोन की इस ताजा एप्लिकेशन से यूजर्स प्रधानमंत्री के शेड्यूल को जान सकते हैं। मतलब उन्हें पहले से पता होगा कि प्रधानमंत्री कब किस स्थान का दौरा करेंगे या फिर किससे मुलाकात करेंगे?


बलरुस्कोनी की एप्लिकेशन बाजार में आते ही देश की सबसे अधिक डाउनलोड की जाने वाली आइफोन एप्लिकेशंस में शामिल हो गई है। आइफोन कस्टमर सर्टिफिकेशन सिस्टम की रैटिंग के आधार पर इसे 5 स्टार में से 4 हासिल हुए हैं। हालांकि अब तक आई एप्लिकेशंस में बलरुस्कोनी के सेक्स स्कैंडल विवाद से जुड़ा फुटेज नहीं है।


वैसे बलरुस्कोनी की इस एप्लिकेशन को बनाने वाले शख्स का पता अभी नहीं चल पाया है। उधर, सरकार भी इससे जुड़े होने की बात से इनकार कर रही है। इससे पहले जनवरी में लुइगी मैरिनो ने मुसोलिनी पर एप्लिकेशन बनाई थी। बाजार में आते ही तानाशाह के भाषणों वाला यह क्लिपिंग देश की दूसरी सबसे अधिक डाउनलोड की जाने वाली एप्लिकेशन बन गई थी। इसमें तानाशाह के भाषणों की क्लिपिंग और कुछ ऐतिहासिक वीडियोज शामिल हैं। प्रत्येक दिन इसे कम से कम 1000 लोग डाउनलोड कर रहे हैं।


उधर बलरुस्कोनी की एप्लिकेशन की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए यह माना जा रहा है कि वे मुसोलिनी को पीछेछोड़ सकते हैं। इस मामले में सरकार ने फिलहाल प्रतिक्रिया नहीं दी है।

आर्किटेक्ट की मदद करेगा सॉफ्टवेयर

वॉशिंगटन. कार्डिफ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है, जो आर्किटेक्ट्स को कमरे में अवांछित आवाजों को कम करने में मदद करता है। यह सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट की बनाई डिजाइन में यह पता लगाता है कि कहां शोर होगा और किस जगह पर आवाज साफ सुनाई देगी। इस सॉफ्टवेयर का उपयोग कर अब आर्किटेक्ट थिएटर, कंसर्ट हॉल, कैफे या रिसेप्शन सेंटरों की बेहतर डिजाइन बना सकेंगे। यह सॉफ्टवेयर कमरे या हॉल में प्रतिध्वनि की जगह और दिशा भी बता सकता है। सॉफ्टवेयर को बनाने वाले प्रो. जॉन कलिंग ने बताया कि यह आर्किटेक्ट्स को अपने डिजाइन में ध्वनि विज्ञान को और गहराई से देखने में मदद करेगा।

Thursday, April 1, 2010

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हीटर का काम करेगा आपका शरीर



वॉशिंगटन. ठंड के दिनों में कमरे को गर्म रखने में काफी बिजली खर्च होती है। लेकिन अब आपका शरीर ही कमरे को गर्म करने के लिए काफी होगा। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और सांडिया नेशनल लैबोरेटरीज के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नैनोमटीरियल बनाया है, जिसे कमरे की दीवारों पर पेंट की तरह पोतकर आप सर्दी के दिनों में उसे खासा गर्म रख सकेंगे। यह मटीरियल गर्मी जरा भी नहीं सोखता, बल्कि उसे विपरीत दिशा में परावर्तित कर देता है। यहां तक कि कमरे में लगे टीवी, म्यूजिक सिस्टम से निकलने वाली ध्वनि तरंगों को भी यह हीट वेव में बदल देता है। आपके शरीर की गर्मी से भी यह कमरे का तापमान बढ़ा सकता है।

घायल सैनिकों की मदद करेंगे रोबोट


लंदन. जंग के मैदान में घायल हुए जवानों को फौरन राहत नहीं मिलने पर उनकी जान जोखिम में पड़ जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए अमेरिकी सेना घायल सैनिकों को जंग के मैदान से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए रोबोट्स की मदद लेने पर विचार कर रही है।


इस तकनीक को आग, भूकंप आदि विपदाओं के समय भी लोगों की जान बचाने के लिए उपयोग में लाया जाएगा। अमेरिकी सेना के लिए ऐसे रोबोट बनाए जा रहे हैं, जो मजबूत हाथों वाले होंगे। वे खुद ही यह पता लगा लेंगे कि घायल जवान कहां पर हैं और उन्हें किस तरह की मदद चाहिए। ऐसे रोबोट्स को जंग के मैदान की भौगोलिक स्थिति के बारे में पहले से पता होगा। उनके पास इलाज के अत्याधुनिक साधन भी होंगे।

शनि के चंद्रमा की हैरतअंगेज तस्वीरें


वाशिंगटन शनि ग्रह के बर्फीले चंद्रमा ‘ऐनसेलेडस’ की तस्वीरों में द्रव और गैस की धाराओं को देखकर नासा के वैज्ञानिक चकित रह गए हैं। ये धाराएं ऐनसेलेडस के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र की प्रमुख दरार से निकलती प्रतीत हो रही हैं।


कैलिफोर्निया स्थित नासा की जेट प्रोपल्सन प्रयोगशाला में कैसिनी प्रोजेक्ट के वैज्ञानिक बॅाब पैपलाडरे के अनुसार ‘‘ऐनसेलेडस से चकित करने वाली जानकारी का सिलसिला जारी है। कैसिनी के हर अभियान से हम इसके बारे में गूढ़ जानकारी प्राप्त करते हैं और यह इसे विचित्र बनाता है।’’


कैसिनी से 14 हजार किलोमीटर की दूरी से ऐनसेलेडस की नवंबर में ली गई इन तस्वीरों से इस दरार के बारे में सबसे विस्तृत तापीय नक्शा मिलने की संभावना है। नासा ने कहा कि इमेजिंग साइंस सबसिस्टम और कंपोजिट इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर द्बारा ली गई तस्वीरों में ‘टाइगर स्ट्रिप’ की ली गई सर्वश्रेष्ठ थ्री डायमेंसनल तस्वीरें शामिल हैं। यह एक छेद सरीखा है जिससे बर्फ के कण, जलवाष्प और जैविक यौगिक निकलते प्रतीत होते हैं।

चेक की फोटो से निकालें पैसे



जल्दी ही आपको चेक भुनाने के लिए बैंक तक नहीं जाना पड़ेगा। यहां बैंक ऑफ अमेरिका और सिटी बैंक इसी साल से एक ऐसी प्रणाली शुरू कर रहा है, जिसमें आपको अपने मोबाइल पर चेक की तस्वीरें खींचनी होंगी। चेक के आगे और पीछे की इन तस्वीरों से आईफोन या अन्य मोबाइल में मौजूद एप्लीकेशन उसमें लिखी रकम, चेक नंबर, आखिर की संख्याओं, चेक लिखने वाले के एकाउंट की जानकारी और संबंधित बैंक के बारे में सब पता लगा लेगा। चेक के पीछे किए गए हस्ताक्षर को भी यह चेक करेगा। यह सारी जानकारी बैंक तक पहुंचने पर क्लियरिंग हाउस फंड ट्रांसफर कर देगा।

कूड़े से बनेगी स्पेन में सात फीसदी बिजली


वॉशिंगटन. जारागोजा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उनके बनाए नए सिस्टम से स्पेन में सात फीसदी बिजली कूड़े से बनाई जा सकेगी। यह बिजली ठोस कचरे, जलशोधन संयंत्र से निकले अवशिष्ट और जैविक कचरे से पैदा होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह से बनी बिजली पूरी तरह से ईको-फ्रेंडली और सस्ती होगी। वैज्ञानिकों ने कहा कि फिलहाल स्पेन में कूड़ा जहां फेंका जाता है, वहां से भारी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है। लेकिन यदि इस कचरे को जलाकर बिजली बनाई जाए तो इससे न सिर्फ पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि लोगों को अत्यधिक कम खर्च पर बिजली मिल सकेगी।

एलसीडी पर लिखिए जो चाहें


लंदन. बच्चों को क्लास में समझाने के लिए बूगी बोर्ड पेपरलेस एलसीडी राइटिंग टैबलेट का जवाब नहीं। नौ इंच लंबे और छह इंच चौड़े इसके प्रेशर सेंसिटिव स्क्रीन पर खास पेन की मदद से आप जो चाहे लिख सकते हैं। यह टेक्स्ट के साथ फोटो भी डिस्पले करता है। इसमें एक फ्लैश मेमोरी और यूएसबी कनेक्टिविटी भी दी गई है। इससे आप लिखी हुई बातों को कंप्यूटर पर दर्ज कर सकेंगे। अपने लिखे हुए को आप स्क्रीन छूकर जब चाहे मिटा सकते हैं। इसकी कीमत 30 से 50 डॉलर (1410-2350 रु.) है।

गए चित्रों में पाया ग

  लंदन. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने शनि के चंद्रमा ए
नसेलॉडस पर जीवन की संभावना जताई है। इसकी सतह 
के नीचे पानी होने के नए साक्ष्य मिलने के बाद यह दावा 
किया गया है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, शनि के चंद्रमा पर भेजे गए सेसि
नी यान ने इसके बर्फीले ज्वालामुखी से निकले बादलों  
के बीच से गुजरकर जल के अणुओं का पता लगाया है
। इस खोज से एनसेलॉडस की सतह के नीचे समुद्र हो
ने की संभावना बढ़ गई है।

पृथ्वी पर भी ये अणु प्राकृतिक झरनों या समुद्र की 
लहरों 

 
में पाए जाते हैं। ब्रिटिश अखबार ‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर एनसेलॉडस पर पानी है तो शनि के इस छठे सबसे बड़े चंद्रमा में जीवन के लिए उपयोगी परिस्थितियां मौजूद हो सकती हैं।

सेसिनी द्वारा लिए गए चित्रों में पाया गया

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180 डिग्री की मूवी स्क्रीन


बर्लिन. अब आप 180 डिग्री हाई रिजॉल्यूशन स्क्रीन पर मूवी देख सकते हैं। फ्रॉनहॉपर हिनरिच हट्र्ज इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने 3.35 गुणा 12 मीटर की एक मूवी स्क्रीन बनाई है, जो 180 डिग्री एंगल पर तस्वीरों को फैला सकती है। इसकी पिक्चर क्वालिटी और साउंड सिस्टम भी गजब का है। इसके लिए एफ32 डीएलपी प्रोजेक्टरों का इंतजाम भी किया गया है। स्क्रीन का रिजॉल्यूशन सात मेगापिक्सेल है। यह सिस्टम इमेज को लंबे टुकड़ों में काटकर उन्हें खास तौर पर बनाए गई मुड़ी हुई सतह पर जोड़ देता है।